ख्वाबों की मंजिल पर हर रोज...
This is a poetry form of dreams under which the poet has tried to focus on the general aspect of the dreams of the common dreamer.

ख्वाबों की मंजिल
ख्वाबों की मंजिल पर हर रोज वह मिलते हैं ।
आसा नहीं है फिर भी बिछड़ते हैं ।
ख्वाहिशें थी अपनी कुछ इस कदर मिल लूँ।
कुछ बोल लूँ, कुछ सोच लूँ,और भी कुछ दूं ।
चलता नहीं है बस इतना विवश मैं हूं ।
लाचार हूं, अज्ञान हूं, जाने जहां मैं हूं ।
मुस्कान जो हर रोज चेहरे पर खिलती है ।
कारण यही है कि हर रोज वह मिलती है ॥
उम्मीद की राह पर नए ख्वाब को बुनतें हैं ।
मंजिल हो आंखों में, नए पथ खुद ही बनते हैं ।
औरों की परवाह अब कैसे करें , जब और ही नहीं करते हैं ।
साथ देना हो तो दो अन्यथा, अब खुद ही हम चलते हैं ।
सुना है इरादों के आगे हर ख्वाब जो पलते हैं ।
ख्वाबों की मंजिल पर हर रोज वह मिलते हैं ॥
यदि धैर्य अटल हो तो हर रोज नए सोपान खुद ही बन जाते हैं ।
मंजिल का क्या हर मुश्किल थम जाती है ।
प्रकृति रहती है नए षड्यंत्र, मिलाने को ।
डगमगाते नहीं वह खुद को, बाधाएं लाख मगर क्यों ना आए।
रचित संसार विरचित क्यों ना हो जाए ।
बस अपनों को संभालते रहते हैं ।
ख्वाबों की मंजिल पर हर रोज वह मिलते हैं ॥
संसार वही रहता है, संसाधन वही रहते हैं ।
बस मात्र इरादों की चट्टान से इंसान वही रहते हैं ।
सब कुछ में बदलाव देख पाते हैं ।
हर संभावनाओं को आजमाते हैं ।
जिंदगी जैसी भी खेल खिलाए हंस के खेल जाते हैं।
यह शूरमा है जो कभी नहीं डगमगाते हैं ।
ख्वाबों की मंजिल पर हर रोज वह मिलते हैं ॥
ख्वाबों की मंजिल पर वह खुद को आजमाते हैं ।
हर पल अपनी एक नई राह बनाते हैं ।
अपनी ही बातों को मुस्कुराकर कह जाते हैं।
कितना भी विरोध क्यों ना हो, वह सबको अपना बनाते हैं।
अहित नहीं करते हैं किसी का, और ना ही ऐसी बातें सोच पाते हैं ।
विस्मृत संस्कृतियों में हर रोज धुलते हैं ।
रुकते हैं, रुकते हैं, रुकते हैं, फिर वह चलते हैं।
ख्वाबों की मंजिल पर हर रोज वह मिलते हैं ॥
सादर
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